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मोदी-तोगड़िया की दोस्ती दुश्मनी में कैसे बदल गई

प्रवीण तोगड़ियाइमेज कॉपीरइट Getty Images

अहमदाबाद में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यालय से रहस्यमय तरीक़े से लापता हुए परिषद के ‘फायर ब्रैंड’ नेता प्रवीण तोगड़िया घटना के 10 घंटे बाद सोमवार रात बेहोशी की हालत में अहमदाबाद एयरपोर्ट के पास मिले.

प्रवीण तोगड़िया का दावा है कि अहमदाबाद और राजस्थान पुलिस ने उनका एनकाउंटर करने का प्रयास किया था. उनका कहना है कि इससे संबंधित जानकारी मिलने के बाद वो परिषद कार्यालय छोड़कर जा रहे थे.

मंगलवार को उन्होंने अस्पताल में मीडिया से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना केंद्र सरकार पर उनकी आवाज़ दबाने और उन्हें डराने का आरोप लगाया.

लेकिन सालों पहले तोगड़िया और मोदी की दोस्ती इतनी गहरी थी कि इसकी चर्चा गुजरात के बाहर भी होती थी.

आज से 35 साल पहले तक अहमदाबाद के कांकरिया विस्तार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में तोगड़िया और मोदी दोनों एक साथ संघ की यूनिफॉर्म पहनकर ‘सदा वत्सल्य मातृभूमि…’ प्रार्थना गाते थे.

इस मामले में बीजेपी के पूर्व मंत्री जनक पुरोहित ने पुराने दिन याद करते हुए बीबीसी से कहा कि 1978 में प्रवीण तोगड़िया अपने गृहनगर से मेडिकल की पढ़ाई के लिए अहमदाबाद के बी.जे. मेडिकल कॉलेज आए थे.

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हिंदुत्व के रंग में रंगे थे तोगड़िया

मेडिकल स्टूडेंट प्रवीण तोगड़िया की दिलचस्पी पहले से ही हिंदुत्व के गौरव और प्रचार पर थी. उनकी इसी विचारधारा के कारण वो संघ में चले गए थे जहां उनकी मुलाक़ात नरेंद्र भाई मोदी से हुई थी.

1980 के दशक की शुरुआत से वो दोस्त बन गए थे. विचारधारा एक होने के चलते मोदी और तोगड़िया की दोस्ती मजबूत हो गई थी.

मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद तोगड़िया ने बतौर डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस शुरू की, लेकिन संघ में उनका आना-जाना चलता रहा.

1985 में अहमदाबाद में सांप्रदायिक उन्माद शुरू हुआ तो प्रवीण तोगड़िया को विश्व हिन्दू परिषद की ज़िम्मेदारी दी गई. सांप्रदायिक उन्माद के दौरान हिंदू पीड़ितों की मदद करने के अलावा डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया ने और भी ज़िम्मेदारियां उठाईं.

तोगड़िया परिषद में थे और मोदी संघ में थे. लेकिन उनका हर क़दम एक साथ और एक ही दिशा में होता था.

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सांप्रदायिक उन्माद के कारण परिषद की भूमिका अहम होती गई और हिंदुओं को विश्व हिंदू परिषद में शामिल करने का काम तोगड़िया ने उठाया.

तोगड़िया के काम से संघ और परिषद दोनों प्रभावित थे. जिसके कारण वो परिषद के मंत्री से गुजरात के प्रमुख बने और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम तेज़ी से उभरा.

साल 1999 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत हुई और हर तरफ़ प्रवीण तोगड़िया की जय जयकार होने लगी थी.

मोदी-तोगड़िया की भूमिका

उससे पहले 1987 में नरेंद्र मोदी भी संघ से निकलकर गुजरात बीजेपी के महामंत्री बन गए थे. नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया का एक ही लक्ष्य था कि गुजरात में बीजेपी की सरकार बने.

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र शर्मा ने बीबीसी को बताया कि गुजरात में बीजेपी को 1990 और 1995-1998 में सत्ता मिली थी और इसमें मोदी और तोगड़िया की महत्वपूर्ण भूमिका थी. यहां तक इन दोनों के बीच में कोई मतांतर नहीं था.

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बीजेपी और केशुभाई की सरकार में प्रभाव

1995 में पहली बार जब बीजेपी की सरकार बनी तो केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे, लेकिन नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया से हर छोटे-बड़े फ़ैसलों में सलाह ली जाती थी.

तोगड़िया के अहमदाबाद के सोला स्थित बंगले के बाहर लालबत्ती वाली कारों की लाइन लगी रहती थी. इस तरह मोदी और तोगड़िया सरकार का हिस्सा नहीं थे फिर भी सत्ता के सूत्र उनके पास थे. ये बात गुजरात के अधिकारियों को पता थी.

इस समय तक प्रवीण तोगड़िया का क़द बढ़ने लगा था. उनको ज़ेड प्लस सिक्योरिटी दी गई थी. जिस तरह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के काफ़िले के साथ पुलिस की चार-पांच गाड़ियां, एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड होती थी वैसा ही रुतबा तोगड़िया का था.

1998 में फिर एक बार जब बीजेपी की सरकार आई तब भी उनका वर्चस्व वैसा ही था. दिसंबर 2002 में तोगड़िया ने बीजेपी के लिए 100 से भी अधिक जनसभाएं की थीं.

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महत्वाकांक्षा के लिए दोस्ती में दरार

2002 में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रवीण तोगड़िया से सभी शक्तियां छीन ली गईं.

वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र शर्मा के शब्दों में कहें तो बीजेपी की (नरेंद्र मोदी की) सरकार में “मुझे कोई पूछता नहीं” स्थिति से तोगड़िया नाराज़ हो गए थे. इस तरह 2002 के बाद उन दोनों के बीच दरार आनी शुरू हो गई थी.

उनके बीच दरार तब बढ़ी जब 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. तब प्रवीण तोगड़िया को मिलने वाली ज़ेड प्लस सिक्योरिटी भी हटा दी गई.

लेकिन गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक डॉ. हरि देसाई ने बीबीसी को बताया कि मानना है कि नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया दोनों ही अपने ओहदे को लेकर महत्वाकांक्षी थे.

वो कहते हैं कि दोनों का लक्ष्य प्रधानमंत्री बनने का था. नरेंद्र मोदी तो कुर्सी तक पहुंच गए लेकिन तोगड़िया पीछे रह गए और यही सत्ता उनकी दुश्मनी का कारण बन गई.

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