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बिहार: वंशवाद पर चुप क्यों है भाजपा?

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Image caption चुनाव रैली में लालू यादव और उनके दोनों बेटे.

राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों के चुनाव मैदान में उतरने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के नेता राजनीति में चल रहे परिवारवाद पर चोट नहीं कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी, भाजपा प्रमुख अमित शाह या उनकी कैबिनेट के 18 मंत्री चुनाव भाषणों में मां-बेटा, बाप-बेटा, बाप-बेटी और मां-बेटी जैसे जुमलों का इस्तेमाल नहीं कर रहे.

बीते साल आम चुनाव से लेकर भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर और झारखंड विधानसभा चुनावों तक इनका बखूबी इस्तेमाल हुआ था.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा नहीं उठाया जा सकता था क्योंकि भाजपा का मुख्य मुक़ाबला आम आदमी पार्टी से था.

राहुल का ननिहाल

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बिहार चुनाव में वंशवाद की राजनीति की आलोचना करने का पूरा मौक़ा होने के बावजूद भाजपा इससे लगातार बच रही है.

मुमकिन है कि भाजपा नेता सोनिया और राहुल गांधी का नाम इसलिए नहीं ले रहे हों कि वे इस चुनाव में महत्वपूर्ण नहीं हैं.

अमित शाह ने ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही कहा कि ईवीएम का बटन दबाएं ताकि “घंटी की आवाज़ राहुल के ननिहाल तक पंहुचे.” इनकी इस बात में विदेशी मूल की ओर संकेत ज़रूर था, पर परिवार के शासन की बात नहीं कही गई थी.

मोदी ने अब तक तक़रीबन दर्जन भर चुनाव सभाओं में भाषण किया है, पर उन्होंने तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के चुनाव मैदान में होने पर कुछ नहीं कहा.

लालू के दोनों बेटे महुआ और राघोपुर विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. वहां 28 अक्तूबर को मतदान है.

रणनीति में बदलाव

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साल 2014 में हुए आम चुनाव में उछाले गए ‘पिंक रिवोल्यूशन’ की तरह ही लालू यादव को घेरने के लिए मोदी ने बीफ़ का मुद्दा उठाया. पर जब उन्होंने देखा कि यह मुद्दा ज़ोर नहीं पकड़ रहा है, मोदी ने अपनी रणनीति बदल ली.

यह समझा जा सकता है कि भाजपा क्यों काला धन, भूमि अधिग्रहण क़ानून, महंगाई और न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे नहीं उठा रही है. पर वंशवाद के मुद्दे पर इसकी चुप्पी कुछ रहस्यमय है.

अगले चार चरणों के चुनाव के लिए प्रचार अभियान के दौरान मोदी अभी कई बड़ी बड़ी सभाएं करेंगे. पर इसकी संभावना नहीं है कि वे तेज़ प्रताप और तेजस्वी यादव का उस तरह मज़ाक उड़ाएंगे जैसा उन्होंने राहुल गांधी का उड़ाया था.

वजह साफ़ है, भाजपा ख़ुद कई परिवारों की चुनौतियों से जूझ रही है. यहां मेरा मतलब संघ परिवार से नहीं है.

अपनों का वंशवाद

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भाजपा के सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और दूसरे नेताओं के परिवार को लोग पार्टी के टिकट पर उनके ख़िलाफ़ विद्रोही उम्मीदवार बन कर चुनाव में उतर चुके हैं.

भाजपा नेताओं के परिवारों से जुड़े ये लोग पश्चिम में बक्सर से पूर्व में भागलपुर तक और उत्तर में चंपारण से दक्षिण में जमुई तक अपनी अपनी तक़दीर आज़मा रहे हैं.

भाजपा राम विलास पासवान, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के मामलों में गठबंधन की मजबूरी का हावाला नहीं दे सकती.

मोदी ने वंशवाद की राजनीति की अनदेखी तो की ही है, उन्होंने उन चुनाव क्षेत्रों में सभाएं नहीं की हैं, जहां पार्टी के बाग़ी उम्मीदवार मैदान में हैं.

इसकी वजह यह है कि इन सीटों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के परिवार के लोगों को टिकट दिया गया है. भागलपुर, ब्रह्मपुर, चनपटिया, जमुई और चकाई कुछ ऐसी ही सीटें हैं.

जमुई-चकाई की कहानी

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जमुई और चकाई की कहानियां तो बेहद दिलचस्प है. पूर्व कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह के दो बेटे चुनाव मैदान में हैं.

वे दोनों ही विधायक हैं जबकि ख़ुद सिंह एमएलसी हैं. सिंह हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा के वरिष्ठ नेता हैं.

विडंवना है कि इन दो बेटों में एक अजय प्रताप सिंह को जमुई से अपनी पार्टी हिंदुस्तान आवामी मोर्चा से नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ना पड़ा.

दूसरे बेटे सुमित सिंह को चकाई से टिकट नहीं दिया जा सका, क्योंकि यह सीट लोक जनशक्ति पार्टी को मिल गई. ऐसे में उन्हें वहां से निर्दलीय उम्मीदवार बना दिया गया.

जनसंघ की नींव

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Image caption नरेंद्र मोदी के साथ सीपी ठाकुर

पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता चंद्र मोहन राय को टिकट नहीं दिया गया तो उन्होंने भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी. यही काम कैलाशपति मिश्र के एक नज़दीकी रिश्तेदार ने किया.

बिहार में भारतीय जनसंघ और भाजपा की नींव रखने वालों में एक कैलाशपति आजीवन कुंवारे रहे. उनके भतीजे की पत्नी दिलमणि देवी को 2010 में बक्सर ज़िले के ब्रह्मपुर से उम्मीदवार बनाया गया था.

लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. ब्रह्मपुर से उनके बदले पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी ठाकुर के बेटे को मैदान में उतारा गया. वे भी उसी जाति के हैं.

दिलमणि देवी इससे काफ़ी भावुक हो गईं और वे इस साल 10 अक्तूबर को जनता दल (युनाइटेड) में शामिल हो गईं.

‘टिकट बिकी’

Image caption आरके सिंह, भाजपा नेता

इसी तरह भाजपा ने बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे के बेटे को भागलपुर में उतारा. भागलपुर भाजपा के नेता विजय शाह ने इस पर पार्टी से बग़वात कर दी और मैदान में कूद पड़े.

पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और आरा के सांसद आरके सिंह ने अपनी ही पार्टी की सार्वजनिक रूप से निंदा कर दी. उनके मुताबिक़, पार्टी ने अपराधियों को टिकट बेचा.

ख़बरों के मुताबिक़, वे पार्टी से ख़फ़ा इसलिए थे कि उनके एक नज़दीकी नेता को पार्टी ने टिकट नहीं दिया था.

परिवार के लोगों में वरिष्ठ नेताओं के उलझे होने की वजह से मोदी ने वंशवाद की राजनीति पर नरम रुख अपनाया.

वे ऐसे तमाम चुनाव क्षेत्रों से बच रहे हैं जहां उन्हें और लज्जित होना पड़ सकता हो.

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