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‘पहले हमें लोग घर तोड़ने वाली कहते थे’

नारी अदालतImage copyright Jaya Nigam

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से 15 किलोमीटर आगे सुलतानपुर-चिलकाना रोड पर एक बड़े हॉल में चार महिलाएं क़रीब 40-50 लोगों की परेशानियों का लेखा-जोखा समझने की कोशिश में लगी हैं.

रश्मि, राजो, सुरेशो और शाहीन यहां हर महीने की 10 तारीख को सुबह 11 से शाम 5 बजे तक नारी अदालत चलाती हैं.

सामाजिक संगठन ‘दिशा’ में सालों से काम कर रही ये महिलाएं औपचारिक न्याय व्यवस्था के विकल्प के रूप में नारी अदालत चलाती हैं.

इनमें मामलों को सामुदायिक स्तर पर बातचीत के ज़रिए सुलझाने की कोशिश की जाती है.

रश्मि बताती हैं, “पहले यहां केवल महिलाएं अपनी समस्याएं लेकर आती थीं, लेकिन अब बहुत सारे पुरुष भी अपने मामले लेकर यहां आने लगे हैं.”

‘मेरा भी कोई है’

Image copyright Jaya Nigam

बीस साल पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नारीवादी कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर, महिला समाख्या कार्यक्रम के तहत देशभर में नारी अदालतें बनाए जाने की शुरुआत की. इनमें सबसे पहली गुजरात में खोली गई थी.

अदालत में महिला समाख्या नामक एनजीओ की कुछ महिलाएं मिल कर महीने में एक या दो बार, सामाजिक स्तर पर सुनवाई करती हैं.

जहां वादी अपनी बात रखता है और संघ की महिलाएं समस्या पर विचार कर दूसरे पक्ष को नोटिस जारी करती हैं. अगर वह नहीं आता तो उसके घर कुछ महिलाएं पहुंच कर बात करती हैं.

मामला सुलझने पर फैसला स्टैंप पेपर पर लिखा जाता है. न सुलझने की स्थिति में कोर्ट की प्रक्रिया में भी यह हर क़दम पर वादी के साथ रहती हैं.

साल 2014 में, शादी के 10 साल बाद उपासना नारी अदालत पहुंची थीं.

वह बताती हैं, “मेरे पति अपने ‘वहम के रोग’ के चलते पिछले साल मुझे तलाक देने पर तुल गए थे. मेरी दो बेटियां हैं. मैं अपने पति से अलग नहीं होना चाहती थी.”

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सुरेशो की ओर देखते हुए वह कहती हैं, “इनकी कोशिशों से हमारा घर बच गया. ये लोग अब भी मेरी खोज-ख़बर लेते रहते हैं. मुझे लगता है, चलो कम से कम मेरा भी कोई है.”

‘साख से मान्यता’

नारी अदालत का काम देख रही इन महिलाओं में केवल रश्मि लॉ ग्रेजुएट हैं जबकि सुरेशो हाई स्कूल पास हैं.

राजो सिर्फ़ अपना नाम लिखना जानती हैं जबकि शाहीन के पास एमए की डिग्री है. क़ानूनी डिग्री न होने पर भी इनके फ़ैसलों की मान्यता देख कर अचरज होता है.

दिशा के संस्थापक केशवनंदन तिवारी इस बाबत कहते हैं, “संगठन की महिलाओं का सालों पुराना काम, इनके फैसलों को सामुदायिक स्तर पर मान्यता दिलाता है.”

उनके मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में नारी अदालत साल 1998 में शुरू हुई थी.

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शुरुआती सालों की मुश्किलों के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, “क़स्बे का साहूकार और ज़मींदार तबका दिशा के काम से पहले ही नाराज़ था, मुस्लिम औरतों के यहां आने पर उन्होंने आदमियों को भी भड़का दिया. उन लोगों ने अफ़वाह फैला दी कि यहां ब्लू फिल्में बनती हैं.”

हिमाचल के कांगड़ा स्थित रक्कड़ और चम्बा में महिला संगठन ‘जागोरी ग्रामीण’ भी नारी अदालतें चला रहा है. जागोरी की रजनी भी कई सालों से यहां हैं.

उनके मुताबिक़, “शुरू में हमें लोग घर तोड़ने वाली कहते थे, लेकिन अब यह अदालतें लोगों को न्याय पाने का सबसे आसान जरिया लगती हैं. हम यहां महिलाओं को अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए प्रेरित करते हैं.”

अब सवाल यह उठता है कि क्या नारी अदालतें, न्याय प्रणाली के समांतर कोई व्यवस्था हो सकती हैं?

सिर्फ़ गरीबों के लिए

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दिल्ली की महिला अधिवक्ता सुनीता ठाकुर कहती हैं, “नारी अदालतें काउंसिलिंग के स्तर पर कारगर हैं लेकिन यह औपचारिक न्याय प्रणाली का मुक़ाबला नहीं कर सकतीं. साथ ही यह अदालतें ज्यादातर निचले तबके की समस्याएँ सुलझाने में ही कारगर रही हैं.”

तो क्या ऐसा है कि नारी अदालतें केवल उनके लिए ही हैं, जो खर्चीली न्याय प्रणाली को वहन नहीं कर सकते?

केशवनंदन के मुताबिक, नारी अदालतों का फोकस हमेशा गांव और क़स्बे ही रहे हैं, इसलिए निम्नवर्गीय लोग यहां ज़्यादा आते हैं.

वह कहते हैं, “इस प्रक्रिया का सस्ता होना इसके कारगर होने की बड़ी वजह है लेकिन संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले हम यहां कम सुलझा पाते हैं.”

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