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नज़रिया: लाल कृष्ण आडवाणी की ‘ये इच्छा’ क्यों रह गई अधूरी

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अप्रैल, 2002 के दूसरे सप्ताह में गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हो रही थी. मीडिया और राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा थी कि गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी के भविष्य पर क्या फ़ैसला होगा.

दिल्ली से उड़े उस विशेष विमान में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी बैठे थे. समुंदर के ऊपर जहाज़ उड़ रहा था. जहाज़ में विदेश मंत्री जसवंत सिंह और सूचना तकनीकी मंत्री अरुण शौरी भी थे.

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बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस दो घंटे की यात्रा में शुरुआत में बातचीत गुजरात पर हुई. अटल जी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, तब उस चुप्पी को जसवंत सिंह ने तोड़ा, बोले, ‘अटल जी, आप क्या सोचते हैं.’

अटल जी ने कहा, “कम से कम इस्तीफ़ा ऑफ़र तो करते.” तब आडवाणी ने कहा कि अगर नरेन्द्र भाई के इस्तीफ़ा देने से गुजरात के हालात सुधरते हैं तो मैं उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए कह दूंगा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे हालात सुधरेंगें और मुझे इस बात पर भी यकीन नहीं हैं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी भी उनके इस्तीफ़े को मंज़ूर कर लेगी.

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मोदी को लेकर वाजपेयी और आडवाणी के मतभेद

सभी जानते हैं कि वाजपेयी की इच्छा के बावज़ूद आडवाणी की वज़ह से नरेन्द्र मोदी का मुख्यमंत्री पद उस दिन बच गया था. ख़ुद लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब “माई कंट्री माई लाइफ़” में लिखा कि जिन दो बड़े मुद्दों पर वाजपेयी और मुझमें एक राय नहीं थी, उसमें पहला अयोध्या का मुद्दा था, जिस पर आख़िर में वाजपेयी ने पार्टी की राय को माना और दूसरा मामला था-गुजरात दंगों पर नरेन्द्र मोदी के इस्तीफ़े की मांग.

आडवाणी ने लिखा कि गोधरा में बड़ी तादाद में कारसेवकों के मारे जाने के बाद गुजरात में साम्प्रदायिक दंगें हो गए थे. इसके बाद विपक्षी पार्टियों ने मोदी के इस्तीफ़े के लिए दबाव बढ़ा दिया था. एनडीए में भी कुछ पार्टियां और बीजेपी में भी कुछ लोग मान रहे थे कि मोदी को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा जाना चाहिए. लेकिन मेरी (आडवाणी )राय इससे बिलकुल उलट थी.

इससे करीब 18 साल पहले चलते हैं जब 1984 के चुनाव में बीजेपी की क़रारी हार के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में भेजा गया था और आडवाणी ने मोदी को गुजरात में काम की ज़िम्मेदारी सौंपीं थी. फिर आडवाणी की इच्छा पर ही उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया.

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मोदी और आडवाणी का रिश्ता

आडवाणी की राम रथयात्रा की गुजरात की ज़िम्मेदारी भी नरेन्द्र मोदी के पास रही. रथयात्रा को पूरे देश में भारी समर्थन मिला था, बिहार में लालू यादव की सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन वही आडवाणी 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों को मस्जिद ढहाने से रोकने की अपील कर रहे थे और मस्जिद गिरने पर दुख जताया था.

ये बात और है कि मौजूदा सरकार में सीबीआई ने इस मसले पर उऩके ख़िलाफ़ चार्ज़शीट दायर कर दी है.

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आडवाणी और नरेन्द्र मोदी के बीच बरसों बरस तक गुरु-शिष्य जैसा रिश्ता बना रहा. मोदी भी आडवाणी को गुजरात से लगातार सांसद बना कर भेजते रहे. और वाजपेयी की तमाम नाराज़गी के बावज़ूद मोदी, आडवाणी के विशेष स्नेह को पाते रहे.

मुझे याद आता है कि 2009 के आम चुनाव प्रचार के दौरान एक इंटरव्यू में मैंने मोदी से जब ये पूछा कि क्या वे अब गांधीनगर छोड़कर दिल्ली जाना चाहेंगें, तो उन्होंनें जवाब दिया कि बीजेपी में मेरे समेत हर कार्यकर्ता का सपना है लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाना. यानी ये रिश्ता हमेशा ही मजबूत बना रहा था.

लेकिन एक बार फिर गोवा चलना पड़ेगा, 2013 में फिर बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी थी. राजनाथ सिंह अध्यक्ष थे और मोदी को अगले साल यानी 2014 के आम चुनाव के लिए पीएम पद का उम्मीदवार बनाने की तैयारी हो गई थी, लेकिन तब आडवाणी ने इस पर नाराज़गी ज़ाहिर कर दी. वे गोवा पहुंचे ही नहीं और उस वजह से उस दिन मोदी की उम्मीदवारी का ऐलान नहीं हुआ, दिल्ली में आडवाणी को फिर से मनाने की कोशिशें बेकार साबित हुईं.

अधूरा सपना

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पार्टी ने सितम्बर में मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने का ऐलान कर दिया और उसके बाद बीजेपी को उस चुनाव में भारी कामयाबी मिली, बीजेपी की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, लेकिन आडवाणी तब भी मोदी के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हुए. आडवाणी शायद उस वक्त तक भी जनता के मूड और समर्थन को हजम नहीं कर पाए थे.

उस वक्त आडवाणी अपने शिष्य की जीत के जश्न में शामिल हो जाते तो उनका बड़प्पन होता. शायद इसी नाराज़गी को मोदी भुला नहीं पाए और आडवाणी की रायसीना हिल की यात्रा अधूरी रह गई यानी आडवाणी राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगें. पीएम इन वेटिंग के बाद प्रेसिडेंट इन वेटिंग, सपना अधूरा रह गया.

बीजेपी समेत ज़्यादातर राजनीतिक दलों में ज़्यादातर लोग आज भी मानते हैं कि आडवाणी से बेहतर कोई उम्मीदवार नहीं हो सकता.

बीजेपी के लिए इससे बड़ा मौका नहीं हो सकता था जब वह अपने स्टेट्समैन को राष्ट्रपति बना देती. नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे विरोधी पार्टी के नेता भी शायद उनके साथ आ जाते. प्रधानमंत्री मोदी को अपना दिल बड़ा रख कर आडवाणी को राष्ट्रपति बनाना चाहिए था, इससे उनकी साख और बढ़ती.

आडवाणी का योगदान

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राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है जनसंघ से लेकर बीजेपी तक के सफर में आडवाणी से ज़्यादा योगदान किसी का नहीं है. बीजेपी की दूसरी पीढ़ी यानी जो आज सरकार में बैठे हैं उसमें से 90 फ़ीसद से ज़्यादा लोग आडवाणी की देन माने जाते हैं.

1984 में बीजेपी की क़रारी हार के बाद उसे 1996 में सरकार बनाने तक पहुंचाने में आडवाणी के योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय नेता होने और संघ परिवार का पूरा आशीर्वाद होने के बावजूद आडवाणी ने 1995 में वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ऐलान करके सबको हैरानी में डाल दिया था, उस वक़्त वे पीएम बन सकते थे, लेकिन आडवाणी ने कहा कि बीजेपी में वाजपेयी से बड़ा नेता कोई नहीं हैं. पचास साल तक वे वाजपेयी के साथ नंबर दो बने रहे.

पचास साल से ज़्यादा के राजनीतिक जीवन के बावजूद आडवाणी पर कोई दाग नहीं रहा और जब 1996 के चुनावों से पहले कांग्रेस के नरसिंह राव ने विपक्ष के बड़े नेताओं को हवाला कांड में फंसाने की कोशिश की थी, तब आडवाणी ने सबसे पहले इस्तीफ़ा देकर कहा कि वे इस मामले में बेदाग़ निकलने से पहले चुनाव नहीं लडेंगें और 1996 के चुनाव के बाद वे मामले में बरी हो गए. ऐसी हिम्मत दिखाना सबके वश की बात नहीं हैं.

आडवाणी का विवादास्पद बयान

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2005 में 4 जून का दिन आडवाणी के राजनीतिक जीवन का एक और अहम दिन, जब कराची में जिन्ना की मजार पर उनके भाषण को याद करते हुए आडवाणी ने कहा था कि जिन्ना सेक्यूलर पाकिस्तान चाहते थे. जिन्ना के पक्ष में खड़े दिखते आडवाणी को लेकर हंगामा हो गया.

संघ के सबसे चहेते नेता आडवाणी को संघ के दबाव में इस्तीफ़ा देना पड़ा था. कुछ नेताओं ने उन्हें दिल्ली में अपना बयान बदलने की सलाह भी दी थी,लेकिन आडवाणी अपनी बात पर अड़े रहे. अपने सिद्धांतों पर खड़े रहना आडवाणी की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है.

एक और किस्से का ज़िक्र ज़रूरी है- देश के पहले राष्ट्रपति के चुनाव में तब के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को राजेन्द्र प्रसाद पसंद नहीं थे, वे सी राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का मानना था कि व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर राजेन्द्र बाबू को ही इस पद पर होना चाहिए क्योंकि वे ज़्यादा योग्य हैं.

नेहरू दबाव डालते रहे ,फिर उन्होंनें कांग्रेस सांसदों की बैठक में राजगोपालाचारी का नाम रखा,लेकिन समर्थन नहीं मिला. इसके बाद पटेल ने जब राजेन्द्र बाबू के नाम का प्रस्ताव रखा तो कांग्रेसी सांसदों ने जोरदार समर्थन किया.

मामला उसी वक्त तय हो गया और नेहरु ने अपनी हार स्वीकार कर ली और राजेन्द्र बाबू प्रधानमंत्री की अनिच्छा के बावजूद पहले राष्ट्रपति बन गए.

वन मैन शो पार्टी

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी भले ही खुद को सरदार पटेल जैसा मानते हों, लेकिन उन्हें अपनी सरकार और पार्टी में कोई विरोध जताने वाला दूसरा पटेल बर्दाश्त नहीं. वैसे हकीकत ये है कि पार्टी और सरकार में इस कद और दम का कोई दूसरा नेता ही आज नहीं दिखता, जो विरोध का स्वर ज़ाहिर कर सके.

विश्लेषकों के मुताबिक अब सरकार और पार्टी सिर्फ़ वन मैन शो है. नतीजा है कि गृहमंत्री रहते हुए खुद की छोटा सरदार पटेल की छवि बनाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को अगले राष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह में अतिथि के तौर पर शामिल होना पड़ेगा,अगर वे चाहेंगें तो.लेकिन किसी ने मुझसे सवाल किया कि क्या राजनीति में भी फुल सर्किल होता है?

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